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राष्ट्रसंत ब्रह्मलीन महन्त अवेद्यनाथ जी महाराज की मनाई गई छठवीं पुण्यतिथि

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युगपुरुष ब्रह्मलीन महन्त दिग्विजयनाथ जी महाराज की 51वीं एवं राष्ट्रसंत ब्रह्मलीन महन्त अवेद्यनाथ जी महाराज की छठवीं पुण्य तिथि के अवसर पर महाराणा प्रताप पी.जी. कालेज, जंगल धूसड़, गोरखपुर में आयोजित सप्तदिवसीय व्याख्यान-माला के चौथे दिन मुख्य वक्ता के रूप में “आयुर्वेद: एक ईश्वरीय वरदान” विषय पर उद्बोधन देते हुए लखनऊ के वरिष्ठ आयुर्वेदाचार्य वैद्य अजय दत्त शर्मा ने कहा कि कोविड-19 की वैश्विक महामारी में आज दुनिया भारतीय चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद की तरफ आकर्षित हुई है। आज यह प्रमाणित हो चुका है कि आयुर्वेद स्वस्थ्य का अचूक मंत्र है। आयुर्वेद ही मानव-पशु जगत को स्थायी स्वस्थ्य का उपहार दे सकता है। आयुर्वेद मानव जगत को प्रकृति एवं भारतीय ़ऋषियों का दिया गया वरदान है। आयुर्वेद वैदिक काल से लेकर आज तक स्वस्थ मानव जीवन एवं प्रगतिशील मानव सभ्यता एवं संस्कृति का मूलाधार बना हुआ है। आयुर्वेद दुनिया की विशिष्ट चिकित्सा पद्धति नहीं है। यह मनुष्य के दैनिक दिनचर्या से घनिष्ठ रूप से जुड़ा हुआ एक प्रकल्प है जो आज के भौतिकवादी एवं भाग-दौड़ और तनाव से भरे रोजमर्रा के जीवन में मानव जगत से दूर होता जा रहा था। नाथ परम्परा में योग और आयुर्वेद का अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान रहा है। नाथ योगियों ने योग और आयुर्वेद के सिद्धान्तों को लोक-कल्याण का आधार मानकर जन-जन तक पहुँचाने का श्रमसाध्य कार्य किया है। वो नाथ योगी ही थे जिन्होंने देश भर में अपने प्रवासों के माध्यम से जन समुदाय तक आयुर्वेद और योग के नियमों के अनुपालन की शिक्षा दी। गोरक्षपीठ आज भी अपनें ब्रह्मलीन पीठाधीश्वरों एवं सिद्धो द्वारा स्थापित इसी परम्परा के निर्वहन में भी लगा हुआ है। गोरक्षपीठ द्वारा स्थापित आयुर्वेद सेवा संस्थानों द्वारा आज भी भारत की इस प्राचीन चिकित्सा पद्धति का अनवरत पोषण किया जा रहा है।

वैद्य अजय दत्त शर्मा ने आगे कहा कि-आयुर्वेद के मूल तत्व हमें प्राचीन वैदिक संहिताओं विशेषतः ऋग्वेद में दिखाई देते है। सम्पूर्ण ऋग्वेद आयुर्वेदिक पद्धतियों से भरा पड़ा है। सम्भवतः इसी कारण आयुर्वेद को ऋग्वेद का उपवेद कहा जाता है। आयुर्वेद पृथ्वी पर जीवनदायनी के समान है। आयुर्वेद के रूप में प्रकृति ने मानव के लिए दीर्घायु का वरदान दिया है। आयुर्वेद प्राचीनकाल से ही भारत की यशस्वी परम्परा में रची बसी है। मनुष्य के शरीर में बीमारियों से लड़ने के लिए स्वयं प्रतिरोधक क्षमता विद्मान रहती है। आयुर्वेद उन क्षमताओं को न केवल निखारता है बल्कि उसे व्यापक स्वरूप प्रदान करता है। आज के आपा-धापी वाली जीवन शैली और असंतुलित आचार व्यवहार के कारण जिस प्रकार से मनुष्य के जीवन पर संकट गहराता जा रहा है और उससे निपटने के लिए जिस प्रकार से एण्टीबायोटिक इत्यादि दवाईयों का प्रयोग बढ़ रहा है उसका परिणाम भयावह है। ऐसे में आज सभी प्रमुख चिकित्सा पद्धतियाँ आर्युेदिक पद्धति को अपनाने की तरफ आगे बढ़ी है। यहाँ तक की एलोपैथी पद्धति भी आर्युेवेद के सिद्धान्त को अपनाकर दवाईयां निर्मित कर रहा है। भारतीय परम्परा में पंच तत्व पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश का समन्वय एवं संतुलन मानव के स्वाथ्य के लिए अपरिहार्य माना गया है। अनेक शोध और अनुसंधानों द्वारा इन पंचतत्वों के संतुलन महत्व को भी स्वीकार किया गया है। इस कारण आज प्रत्येक मनुष्य के लिए आर्युेवद के विज्ञान को समझना अत्यन्त आवश्यक है। शिक्षण संस्थाओं में भी आयुर्वेद की महत्ता एवं चिकित्सा पद्धति को पाठ्यक्रम के रूप में शामिल किया जाना अवश्यंभावी है।

कार्यक्रम में अध्यक्षीय उद्बोधन देते हुए महाविद्यालय के प्राचार्य डाॅ. प्रदीप कुमार राव ने कहा कि आज के इस भाग दौड़ भरे समाज में मनुष्य अशान्ति और रूग्णता से भर चुका है। भौतिक विकास के चरम बिन्दु की ओर बढ़ते विश्व में असंतोष, गलाकाट प्रतिस्पर्धा, अशान्त मन इत्यादि मानसिक भावना के वंशीभूत मनुष्य खुद को एक गम्भीर संकट में फँसा हुआ देख रहा है। ऐसे परिस्थितिजन संकटों से सिर्फ और सिर्फ आयुर्वेद के सिद्धान्त ही समाज को उबार सकते है। आज दुनियाँ जिस वैश्विक महामारी कोरोना से जूझ रही है, वह आयुर्वेद के श्रेष्ठ सिद्धान्तों की अवमानना और अवहेलना का ही परिणाम है। निरन्तर प्रगति और आविष्कारों के पथ पर बढ़ता हुआ मानव समाज आयुर्वेद से विमुखता के कारण ही सुख एवं शांतीपूर्ण जीवन शैली से दूर होता जा रहा है। ऐसी स्थिति में आयुर्वेद के सिद्धान्तों की प्रासंगिकता पुनः समाज में स्थापित करनी ही होगी। जब तक समाज आयुर्वेद में बताए गए सिद्धान्तों को नहीं अपनाएगा और आयुर्वेद सम्मत दैनिक दिनचर्या का अनुपालन नहीं करेगा, तब तक वह सुख और प्रसन्नचित जीवन का भोग नहीं कर पाएगा। इससे पूर्व महाविद्यालय के वनस्पति विज्ञान विभाग के प्रभारी डाॅ. अभय कुमार श्रीवास्तव ने व्याख्यान कार्यक्रम के मुख्य वक्ता वैद्य अजय दत्त शर्मा का स्वागत किया। कार्यक्रम का संचालन व्याख्यान-माला के संयोजक सुबोध कुमार मिश्र ने किया। महाविद्यालय के फेसबुक और यू-ट्यूब चैनल पर बड़ी संख्या में शिक्षक, विद्यार्थी और श्रोतागणों ने अपनी सक्रिय उपस्थिति दर्ज कराई।

 

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